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कमीशनखोरी में उलझी शिक्षा की गुणवत्ता

Posted On: 6 Jun, 2013 Others में

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विद्यालय खुलने में अभी वक्त है , लेकिन किताबों का बाजार जोर पकड़ने लगा है । निजी विद्यालयों की भारी भरकम रंगीन पुस्तकों की लम्बी सूची अभिभावकों की जेब कतराने के लिए अपनी धार तेज किये बैठी है । शिक्षा के इस आर्थिक विद्रूपपन में शिक्षा की गुणवत्ता के साथ खुलेआम खिलवाड़ हो रहा है ।

अमानक पाठ्य सामग्री —–

अधिकांश निजी प्रकाशक आर्थिक लाभ को ध्यान में रखकर सस्ती , अमानक या अनुसंधानरहित सामग्री से पुस्तकों का निर्माण करते हैं ।बाजार इन्हीं गुणवत्ताविहीन पुस्तकों से भरा पडा है । इन पुस्तकों के लेखक भी प्रायः अनुभवहीन और अकुशल लोग ही होते हैं । जबकि ” राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा २००५ ” एक से लेकर बारहवीं तक के पाठ्यक्रम का फ्रेमवर्क तय कर शिक्षा सामग्री की गुणवत्ता तय कर चुकी है । इसी प्रकार ” शिक्षा का अधिकार अधिनियम २०१०” के द्वारा एक साधारण प्राथमिक अध्यापक तक की गुणवत्ता एवं कुशलता को निर्धारित किया जा चुका है । ऐसे में अमानक पुस्तकों की बाजार और विद्यालयों में उपस्थिति शिक्षा के साथ एक बड़ा खिलबाड़ ही है ।

कमीशनखोरी का क्रूर पंजा —–

इन अमानक एवं गुणवत्ताहीन पुस्तकों के जारी प्रचलन का एकमात्र कारण इनके द्वारा दिया जा रहा अंधाधुंध कमीशन है । बाजार के सूत्रों से पता चलता है की ऐसी पुस्तकों कपर ४० से लेकर ६०-७० प्रतिशत तक कमीशन दिया जाता है , जो विक्रेताओं से लेकर सम्बंधित विद्यालयों तक में बँट जाता है ।

विकल्प बेहतर है ——

आप किसी भी अच्छे कोचिंग संस्थान में चले जाइये या किसी ऊंची सेवा परीक्षा में सफल अभ्यर्थियों से संपर्क कर लीजिये , विषय की बेहतर समझ और प्रमाणिक ज्ञान के लिए एन सी आर टी की ही पुस्तकों का नाम लिया जाता है । आई ए एस टॉपर्स तक यह सलाह देते हैं की विषय की प्राथमिक जानकारी हेतू एन सी ई आर टी की जूनियर , १०वीं और १२वीं की पुस्तकें पढनी चाहिए । इसका कारण भी स्पष्ट है , ये पुस्तकें देश के अग्रणी विद्वानों द्वारा व्यापक विचार-विमर्श और अनुसंधानों के पश्चात निर्मित होती है । और ना सिर्फ एन सी ई आर टी बल्कि राज्य बोर्डों की पुस्तकें भी इतनी ही लाभदायक एवं प्रमाणिक हैं । उत्तर प्रदेश की जूनियर और अन्य उच्च कक्षाओं की पुस्तकें , निजी प्रकाशकों की भारी-भरकम और रंग-बिरंगी पुस्तकों से कहीं अधिक गुणवत्तापूर्ण और मानकीकृत हैं ।

सरकारी विद्यालयों में तो राज्य बोर्डों की पुस्तकें चलती ही हैं , निजी विद्यालयों में पड़ने वाले बच्चों के अभिभावकों चाहिए की वे विद्यालयों पर एन सी ई आर टी की पुस्तकों को प्रचलित करने का दबाव बनाएं । हालांकि निजी विद्यालयों के पास कई बहाने भी हैं , जैसे की निजी पुस्तकों पर भी स्पष्ट लिखा होता है की सी बी एस ई या एन सी ई आर टी पाठ्यक्रम पर आधारित । एक और बहाना है कि बाजार में एन सी ई आर टी की पुस्तकें उपलब्ध ही नहीं हैं । यह सिर्फ भरमाना ही है । भला जब मौलिक एन सी ई आअर टी की पुस्तकें ही उपलब्ध हैं तो आधरित पुद्तकों का बोझ क्यों डाला जाये । फिर जब बाजार में एन सी ई आर टी की पुस्तकों की मांग बदने लगेगी तो उनकी पूर्ती भी स्वतः ही होने लगेगी । अतः अपने बच्चों के लिए ऊंचे सपने देखने वाले अभिभावकों को कमीशनखोरी के इस दुश्चक्र को तोड़ते हुए निजी विद्यालयों पर एन सी ई आर टी की प्रमाणिक पुस्तकों के प्रचलन के लिए अवश्य ही दबाव बनाना चाहिए । अरे भाई ! कल के दिन हमारे बच्चे प्रशासनिक सेवाओं की तैयारी के लिए इन्हीं पुस्तकों की और लौटें , उससे बेहतर तो यही है की आज से ही वह इनसे परिचित हो जाएँ । सभी विद्यर्थियों को शुभकामनाएं ।

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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

anilkumar के द्वारा
June 10, 2013

प्रिय अरुण जी , आज पूरी शिक्षा व्यवस्था , प्रायमरी से लेकर उच्च शिक्षा तक सब बाजार के हवाले है । आप ने जितना प्रस्तुत किया है , वह तो शिक्षा के विस्त्रत सागर में भ्रष्टाचार , रिश्वतखोरी कमीशनखोरी के विशाल हिमखण्ड का मात्र उपरी सिरा है । यदि पूरे हिमखण्ड के बारे में लिखा जाए तो एक विशाल पुस्तक तैयार हो जाएगी

    arunsoniuldan के द्वारा
    June 11, 2013

    आदरणीय,      निसंदेह , आपका कथन सत्य है । प्रतिक्रिया हेतु बहुत-बहुत आभार ।

nishamittal के द्वारा
June 6, 2013

आपकी प्रदत्त जानकारी पूर्णतया सही है ,हर क्षेत्र इस कमीशनखोरी का व्यापार बना हुआ है,एक समय था जब उच्चस्तरीय पुस्तकों को खोज जाता था परन्तु अब सब कमीशन में खो गया.

    arunsoniuldan के द्वारा
    June 8, 2013

    आरणीया , अवलोकन एवं उत्तम प्रतिक्रिया हेतु आभार …..


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